आहार-विज्ञान 2019
आहार विज्ञान
अखिल विश्व जैन मिशन न्यास
(भारतीय "आयकर अधिनियम 1961 की धारा १२ (ए) के अधीन पंजीकृत
विशिष्ट पंजीकरण संख्या (यू.आर.एन.) 41/1067/2016-17
आयकर अधिनियम की धारा 80G (V) दिनांक 6-2-2017 से प्रभावी
एफ सी आर ए २०१० के अधीन पंजीकरण संख्या 136550498 विदेश से सहयोग प्राप्त करने के लिए
दिनांक 15 5 2018 को पंजीकृत)
बी-१ / २३, सेक्टर जी, जानकीपुरम, लखनऊ 226021
आहार-विज्ञान
बैठक रिपोर्ट
श्री दिगम्बर जैन मंदिर गोमती नगर में दिनांक १६-१२-२०१८ को प्रातः ११.१५ बजे श्री धर्मवीर जी, डॉक्टर वृषभ प्रसाद जैन, पंडित श्री विनोद कुमार जैन, रजवाँस, श्री राजीव कुमार जैन, डॉक्टर पी के जैन, श्री निकांत जैन आदि की उपस्थिति में आहार विज्ञान के विषय में विचार-विमर्श करने और आगे की रूपरेखा तय करने के लिए एक बैठक हुई, जिसमें समाज के अनेक अन्य गणमान्य व्यक्ति भी सम्मिलित हुए। प्रारंभ में डॉक्टर वृषभ प्रसाद जैन से अनुरोध किया गया कि वे इस कार्यक्रम के उद्देश्य पर अपने विचार प्रस्तुत करें। डॉक्टर साहब ने बताया कि विगत अनेक वर्षों में हमारा समाज हमारे आहारविज्ञान पर समुचित ध्यान नहीं दे पाया है, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि हमारे परिवारों में, जो भोजन-पद्धति थी, धीरे-धीरे ही वह लुप्त होती जा रही है, जबकि हमारी आहार पद्धति बहुत सबल वैज्ञानिक आधारों पर खड़ी थी।चूँकि आहार अपने में एक सम्पूर्ण विज्ञान है और उसका हमारे मन, मस्तिष्क, विचार एवं शरीर पर पूरा प्रभाव पड़ता है।आदमी जैसा आहार करता है, उसकी सोच उससे प्रभावित होती है, इसलिए आहार का संबंध मस्तिष्क से भी है। आहार की शुद्धि से ही आत्मा की शुद्धि जुड़ी हुई है। ......,,किंतु आज की नई पीढ़ी से केवल धर्म के आधार पर उसे मानते रहने की यदि हम बात करेंगे, तो वह उसे न मानेगी, हम यह व्यावहारिक रूप में भी देख रहे हैं कि वह उससे दूर होती जा रही है। इसके लिए हमें उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आज की भाषा में बताना होगा, तभी वह मानने पर विचार कर सकती है या मानेगी। पंडित विनोद कुमार जी ने बताया कि हमारी आहार-पद्धति पूरी तरह वैज्ञानिक व ऋतुओं के अनुकूल रही है। हमारे यहाँ बात तो यहाँ तक रही है कि उत्सव विशेष पर ख़ास व्यंजन बनते थे। वे व्यंजन औषधीय गुणों से युक्त होते थे, जिनका प्रभाव लंबे समय तक अर्थात् अगले उत्सव आने तक रहता था। इसप्रकार भोजन को हमारे यहाँ औषधि के रूप में भी लिया गया है, इसीलिए ऋतु के अनुसार और उत्सव के अनुसार भोजन की बात की गई अर्थात् किस समय, कौन-सा भोजन, कितनी मात्रा में किया जाना चाहिए, इसकी चर्चा भी लंबी मिलती है। सामान्यत: मकर संक्रांति के समय हमारी जठराग्नि जागृत होती है और उस समय कुछ भी खाएँ, वह सुपाच्य होता है। आज की नई पीढ़ी इस चर्चा से लगभग अनभिज्ञ है। भोज्य वस्तुओं की सूची में इंदरसे की बात भी हुई, जो पहले कुदई के चावल से बनता था। आज हम इन-सब चीज़ों को धीरे-धीरे हम भूलते जा रहे हैं। पंडित जी ने बुंदेल खंड में जैन परिवारों में बनने वाले 50 व्यंजनों की एक सूची भी प्रस्तुत की। बैठक के बाद में डॉक्टर साहब ने पंडित जी से यह अनुरोध किया कि उनके परिवार की बहू और बेटियाँ अपनी सासों से बातचीत कर इन व्यंजनों की रेसिपी व बनाने की प्रक्रिया पर लिखकर हमें सूचित करें, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। पंडित विनोद कुमार जी ने यह भी बताया कि द्रव्य विशेष की मर्यादा के बाद उसमें जीवराशि पैदा होने लगती है और उसमें त्रसकायिक जीव भी होते हैं तथा वनस्पतिकायिक भी। मशरूम आदि इसी प्रकार की जीवोत्पत्ति के परिणाम हैं। फंगस का ही एक रूप मशरूम के रूप में आज बाज़ार में बेचा जा रहा है।
आहार की परिभाषा के समय केवली के आहारक रूप की भी चर्चा हुई।
यह बात भी चर्चा में उठी कि आहार तीन प्रकार का होता है—सात्विक, राजसी और तामसी। हमें तामसिक भोजन से बचना चाहिए। लहसुन प्याज़ का भोजन तामसिक भोजन की श्रेणी में आता है। रोटी, दलिया, दाल, फलाहार आदि सात्विक भोजन में गिना जाता है। हमें आधा पेट भोजन और चौथाई पेट पानी से भरना चाहिए तथा चौथाई पेट वायु के संचरण के लिए ख़ाली रखना चाहिए।
इसके बाद डॉक्टर साहब ने पुनः प्रकाश डाला कि हम अपने परिवारों में क्या-क्या खाते थे, कब-कब खाते थे, उसे कैसे बनाते थे, उनके गुणधर्म क्या-क्या थे? ...व्यंजन विशेष की समयानुकूल क्या क्या लाभ और हानियाँ थी......क्षेत्र के हिसाब से इसकी एक विस्तृत सूची सर्वेक्षण के बाद सबसे पहले बनानी चाहिए। सूची बनने के बाद व्यंजन विशेष के चिकित्सीय गुणों मेडिसिनल वैल्यू एवं पोषण मूल्यों न्यूट्रीशियस वैल्यू की जाँच करवाई जाए। होटल मैनेजमेंट से जुड़े हुए लोगों जैसे शैफों, उद्योगपतियों आदि को भी इससे जोड़ना होगा। चूँकि यह काम बहुत बड़ा है, अतः इस काम को करने के लिए तत्संबंधी लोगों से चर्चा करनी होगी और उसके लिए विभिन्न समितियाँ भी बनानी होंगी।इसमें संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों— जैन व जैनेतरों से भी मदद लेनी होगी।इस सबके बाद हमें जनजागरण का काम भी करना होगा, ताकि हमारे इस काम के बारे में आमजन समझ सकें और उसे अपने जीवन में अपना सकें।
अभी प्रारम्भ में हम निम्न प्रकार की समितियाँ बनाएँगे—
१. चूँकि इस काम को करने के लिए प्रभूत धन की आवश्यकता होगी, अत: एक धन संग्रह /फंड रेजिंग समिति;
२. पूरी व्यवस्था को सहयोग देने के लिए या सुचारु रूप से चलाने के लिए एक सहयोग समिति;
३. पूरी व्यवस्था समुचित रूप से चल सके, इसके लिए एक प्रबंध समिति भी बनानी होगी;
यह काम उच्च प्राथमिकता पर किए जाने की अपेक्षा एवं आवश्यकता है, अत: डॉक्टर साहब ने कहा कि जब तक नई संस्था खड़ी हो, तब तक के लिए अखिल विश्व जैन मिशन न्यास के अधीन एक आहार विज्ञान समिति बनाकर इस काम को आगे बढ़ा सकेंगे।
डॉक्टर साहब ने आगे कहा कि इस कार्य को करने व कराने के लिए हमें कुछ पूर्णकालिक लोगों को भी लगाना होगा, जिन्हें कुछ मानदेय पर रखना होगा।सर्वेक्षण के कार्य के लिए MSW उत्तीर्ण या अध्ययनरत कुछ छात्रों को /शोधार्थियों को लगाना होगा।
श्री धर्मवीर जी ने कहा कि अभी मंदिर जी में संग्रह राशि में से हम दो लाख रुपया इस कार्य के लिए उपलब्ध कराने हेतु अगली बैठक में निर्णय ले लेंगे।
आज कल तरला दलाल और संजीव कपूर जैसे सैफ़ भी जैनफूड की बात करने लगे हैं। इससे स्पष्ट है कि जैनों के आहार, पाक कला व उसके पोषक मूल्य से जुड़ने वाले आहार विज्ञान का संसार भी बड़ा है और बाज़ार भी बड़ा। हम उसे कैसे दिशा दे पाएँ ? ....यह हम पर और हमारे यत्नों पर निर्भर करेगा।
यह बात भी चर्चा में उठी थी कि जैन फूड के नाम पर रेस्तराओं में, एयरलाइंस में कुछ भी परोसा जा रहा है। वास्तव में यह भी पता नहीं कि वह जैन फूड है भी या नहीं ?..... केवल लहसुन और प्याज़ के बिना बनाये गए फूड को ही जैन फ़ूड मान लिया जाता है। अतः जैन फूड की हमें परिभाषा निश्चित कर देनी होगी।
जनजागरण के समय हमें सोशल मीडिया, विज्ञापन चैनलों व विद्यालयों के संपर्क का प्रयोग भी करना होगा और इसमें बच्चों को भी जोड़ना होगा । रेसिपी बनाने में भी बच्चों की सृजनात्मकता का उपयोग किया जा सकता है।
यह काम निम्न पाँच स्तरों पर होगा—
१. सर्वेक्षण का काम
२. पाक कला का काम, सैफ़ आदि से मिलकर
३. पोषण मूल्य निकालने का काम न्यूट्रीशियस वैल्यू
४. चिकित्सकीय मूल्य अर्थात् व्यंजन के प्रभाव निकालने का काम मैडिसिनल वैल्यू
५. और उपर्युक्त किए गए काम के आधार पर जनजागरण एवं प्रचार प्रसार करने का काम
सर्वेक्षण का काम हमें दो स्तरों पर करना होगा-- पहले हमें शास्त्र परंपरा और साहित्य का सर्वेक्षण भी करना होगा और दूसरे स्तर पर आज लोक में व्याप्त आहार से संबंधित प्रयोगों को भी संकलित करना होगा और इस प्रकार साहित्य संसार के साथ साथ सर्वेक्षण के द्वारा लोक में व्याप्त भोजन की स्थिति की सूची बन सकेगी। जो आगे किए जाने वाले कार्यों की दिशा तय करेगी।
अंत में णमोकार महामंत्र के पाठ के साथ बैठक विसर्जित की गई।
इस विषय पर जो भी मित्र, साधर्मी, सहयोगी हमारे साथ जिस किसी रूप में भी (आर्थिक, बौद्धिक, सांगठनिक सहयोग देकर, सर्वेक्षक, सर्वेक्षण सहायक, सर्वेक्षण व्यवस्थापक, कुछ धनराशि लेकर सहयोगी बनकर, बिना धनराशि के सहयोगी बनकर आदि आदि), जिस किसी क्षेत्र से भी जुड़कर काम करना चाहते हैं, वे हमसे निम्न पर संपर्क कर सकते हैं—
vrashabh.jain@gmail.com
निम्न whatsapp समूह पर संपर्क कर—
आहार विज्ञान
निम्न मोबाइल पर sms सन्देश के द्वारा अभिरुचि व्यक्त कर—
९४५३३२३११३, ९८११७८५२४६ प्रस्तुति: वृषभ प्रसाद जैन
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